नमस्कार , मैं अश्वनी प्रकाश पालीवाल ताज नगरी आगरा का निवासी हूँ , ब्लॉग लिखना मेरे लिए मेरे अंतर्मन की अभिव्यक्ति का एक माध्यम है ,उम्मीद करता हूँ आप सभी धीरज से मेरी लेखनी पर ध्यान देंगे.
Tuesday, August 17, 2010
"Corruption"
Corruption is now a part and parcel of our value system ,We Indians have taken corruption for granted as corruption is just "Breaking News" we just love to watch and read . Therefore no corrupt person is ever shaken or perturbed.
Thursday, August 5, 2010
राष्ट्रमंडल खेल [सब गोलमाल है भाई सब गोलमाल है]
मित्रों हम सभी अब तक इन खेलों की आड़ में हो रही घपलेबाजी के बारे में काफी कुछ पढ़ व देख चुके होंगे। परन्तु हमारे जेहन में एक बात आती है कि राजनेताओं और पत्रकारों को पिछले कई महीनों और वर्षों से हो रहे किसी भी घपले कि भनक अभी ही क्यों लगी है? मुझे तो एक ही चिंता है कि इन खेलों का आयोजन इस प्रकार से हो जाए कि आम भारतीय का सर शर्म से न झुके । क्या कॉमन वेअल्थ के इस कीचड में कोई कमल खिल पायेगा?
Friday, July 23, 2010
मिड डे मील यानी शिक्षा का बंटाधार.
मित्रों,
हम सभी ने अखबारों और टी.वी पर मिड डे मील या मध्यान्ह भोजन के बारे में सुना होगा जो की भारत सरकार द्वारा मुफ्त में सभी सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त प्राथमिक और जूनियर स्कूलों में विद्यार्थियों को खिलाया जाता है ।
यह योजना भूतपूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव के शाशन काल में शुरू की गयी थी क्योंकि उस समय सरकारी गोदामों में जरूरत से ज्यादा गेहूं इकठ्ठा हो गया था और चूंकि वह हलकी क्वालिटी का होने के कारण एक्सपोर्ट नहीं हो सकता था , इसलिए यह योजना गेहूं के अतिरिक्त स्टॉक को ख़तम करने के लिए लागू हो गयी है।
आज की तारीख में यह योजना सरकारी शिक्षा विभाग की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि है। साथ ही यह इस विभाग के कर्मचारियों की जेबों को भरने का एक तरीका भी बन चुका है।
आज हालात ऐसे हैं की चाहें किसी विद्यालय में पढ़ाई हो न हो खाना ज़रूर बटेंगा, अध्यापकों और प्रधानाचार्यों पर कक्षा न लेने अथवा छात्रों को न पढ़ाने पर कार्यवाही तो नहीं होगी परन्तु यदि मिड डे मील नहीं वितरित हुआ तो कार्यवाही निश्चित है।
प्रतिदिन समाचार पत्रों में आप किसी न किसी विद्यालय में घटिया भोजन पअरोसे जाने की अथवा इस योजना के अनाज को बाज़ार में बेचे जाने की खबर तो ज़रूर पढ़ते होंगे , परन्तु कहीं भी यह नहीं बताया गया की इन विद्यालयों में शिक्षा का इस्तर कैसा है? विद्यार्थी कुछ सीख भी रहे है या नहीं? क्योंकि मास्टरजी ने यदि ठीक से मिड डे मील खिलवा दिया तो उनकी ड्यूटी पूरी। मुझे यह समझ में नहीं आता की जब सरकार रियायती दर पर खाद्यान उपलब्ध करा रही है या गरीब लोगों को मुफ्त अनाज बाँट रही है , तो फिर ऐसी योजना को क्यों चला रखा है?
इस मिड डे मील ने तो भ्रष्टाचार के कीर्तिमान बना दिए हैं और पढाई लिहाई ख़तम हो रही है। कई स्कूलों में तो छात्र सिर्फ भोजन करने आते हैं।
इसलिए सरकार को शिक्षा पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए और पौष्टिक आहार की उपलब्धता बढानी चाहिए परन्तु स्कूलों को सर्वप्रथम शिक्षा पर ही ध्यान देना चाहिए.
Wednesday, June 2, 2010
निराशा और आशा का द्वन्द.
मित्रों ,
हम सभी अपने जीवन में कभी न कभी इस प्रकार के द्वन्द से गुजरे हैं ,जब हमारे मन में आशा और निराशा के बीच एक द्वन्द होता है। इसका क्या कारण है?
हम सभी अपने जीवन में कभी न कभी इस प्रकार के द्वन्द से गुजरे हैं ,जब हमारे मन में आशा और निराशा के बीच एक द्वन्द होता है। इसका क्या कारण है?
Saturday, April 24, 2010
आई पी एल वालों को सलाह.
मित्रों ,
पिछले दिनों से चल रहे हंगामे पर मैं सिर्फ एक फिल्मी संवाद लिखना चाहूंगा श्री ललित मोदी जी के लिए , " चिनॉय सेठ जिनके घर शीशे के होते हैं वोह दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकते."
पिछले दिनों से चल रहे हंगामे पर मैं सिर्फ एक फिल्मी संवाद लिखना चाहूंगा श्री ललित मोदी जी के लिए , " चिनॉय सेठ जिनके घर शीशे के होते हैं वोह दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकते."
Sunday, April 18, 2010
ललित थरूर और शशि मोदी
मित्रों ,
आज उपरोक्त शब्द मैंने एक समाचार पत्र में पढ़े तो मुझे लगा की कितना सही लिखा है। मेरा मतलब है की दोनों के नामों का उलटफेर यह बताता है कि दोनों के आचरण में सामानता है। मैं आई पी अल से जुड़े विवाद को जब देखता और सुनता हूँ तो मुझे लगता है उपरोक्त दोनों लोग अपने हित को ही सर्वोपरि मान कर आई पी अल का इस्तेमाल करना चाहते हैं । क्योंकि दोनों के निजी हितों में टकराव हो गया तो यह सब हमारे सामने है। अरे भाई आई पी अल मोदी , सरकार या बीसीसी आई कि कैसे हो सकती है यह तो क्रिकेट प्रेमियों की है। इस में जो कोई भी पैसा लगा रहा है वोह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से क्रिकेट के प्रति आम भारतियों की दीवानगी को भुनाने के लिए है। एक तरफ ललित मोदी ने इसे एक जेबी संगठन बना दिया और शशि थरूर जैसे चाँद लोगों ने इसे मुफ्त में पैसा और नाम कमाने का जरिया बना लिया है। एक क्रिकेट प्रेमी के रूप में मुझे तो यह बहुत दुखद लग रहा और ललित मोदी और शशि थरूर के बारे में नयी नयी हंगामेदार जानकारी छापी और दिखाई जा रही है परन्तु कहीं से भी क्रिकेट प्रेमियों के साथ हो रहे इस खुले छलकी बात नहीं हो रही है । मैं समझता हूँ की किसी भी खेल के लिए सबसे महत्वपूर्ण उसके खिलाड़ी और खेलप्रेमी होने चाहिए और मीडिया सरकर या हम को संघठित हो कर इन बिचौलिए और खेल से गलत फायदा उठाने वालों का विरोध करना चाहिए।
आज उपरोक्त शब्द मैंने एक समाचार पत्र में पढ़े तो मुझे लगा की कितना सही लिखा है। मेरा मतलब है की दोनों के नामों का उलटफेर यह बताता है कि दोनों के आचरण में सामानता है। मैं आई पी अल से जुड़े विवाद को जब देखता और सुनता हूँ तो मुझे लगता है उपरोक्त दोनों लोग अपने हित को ही सर्वोपरि मान कर आई पी अल का इस्तेमाल करना चाहते हैं । क्योंकि दोनों के निजी हितों में टकराव हो गया तो यह सब हमारे सामने है। अरे भाई आई पी अल मोदी , सरकार या बीसीसी आई कि कैसे हो सकती है यह तो क्रिकेट प्रेमियों की है। इस में जो कोई भी पैसा लगा रहा है वोह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से क्रिकेट के प्रति आम भारतियों की दीवानगी को भुनाने के लिए है। एक तरफ ललित मोदी ने इसे एक जेबी संगठन बना दिया और शशि थरूर जैसे चाँद लोगों ने इसे मुफ्त में पैसा और नाम कमाने का जरिया बना लिया है। एक क्रिकेट प्रेमी के रूप में मुझे तो यह बहुत दुखद लग रहा और ललित मोदी और शशि थरूर के बारे में नयी नयी हंगामेदार जानकारी छापी और दिखाई जा रही है परन्तु कहीं से भी क्रिकेट प्रेमियों के साथ हो रहे इस खुले छलकी बात नहीं हो रही है । मैं समझता हूँ की किसी भी खेल के लिए सबसे महत्वपूर्ण उसके खिलाड़ी और खेलप्रेमी होने चाहिए और मीडिया सरकर या हम को संघठित हो कर इन बिचौलिए और खेल से गलत फायदा उठाने वालों का विरोध करना चाहिए।
Thursday, April 8, 2010
माओवादी हिंसा का वीभत्स रूप
मित्रों ,
सर्वप्रथम मैं पिछले दिनों माओवादियों के हाथों शहीद हुए जवानों को हार्दिक श्रधांजलि दूंगा । अब मुझे लगता है कि नक्सली हिंसा काबू से बाहर हो रही है, हमारी प्रांतीय सरकारों कि उदासीनता ने इस असुर को भस्मासुर बना दिया था। यद्यपि मुझे लगता है कि शायद पहली बार पीचिदंबरम के नेतृत्व में भारत सरकार और विशेष कर गृह मंत्रालय इस समस्या से लड़ने को सक्रिय हुआ है। मेरे विचार से सरकार को खुली चुनौती स्वीकार करते हुए माओवादियों पर युद्ध बोल देना चाहिए नहीं तो यह समस्या हमारे देश को आगे चल कर न जाने कितने टुकड़ों में विभाजित करवा देगी।
साथ हे दूसरी ओरे मुझे मीडिया खासकर टी वी चैनलों से भारी शिकायत है , जितना वक़्त शोइअब सान्या के विवाह की खबर पर दिया गया शायद उसका आधा वक़्त भी इस माओवादी हिंसा को नहीं दिया गया। सबसे दुखद बात तो यह है की बहुत से टी वी पत्रकार अपनी रिपोर्ट्स में अक्सर नक्सली और माओवादियों के प्रति सहानुभूति दर्शाते रहते हैं , मेरे ख़याल से यह तो गलत हो रहा है , मैं मानता हूँ की सरकारी मशीनरी और पोलिसे बहुत भ्रष्ट है और अपने कई काम भी ठीक से नहीं कर सकती हैं , परन्तु हमारे देश की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया करीब करीब बेदाग़ रही है। माओवादियों या नक्सलियों को मुख्या धारा में आकर जनता के हितों के लिए लड़ना चाहिए और भ्रष्ट नेताओं को हराना चाहिए ; जो की भ्रष्टाचार की असली जड़ हैं । परन्तु हिंसा निंदनीय है.
सर्वप्रथम मैं पिछले दिनों माओवादियों के हाथों शहीद हुए जवानों को हार्दिक श्रधांजलि दूंगा । अब मुझे लगता है कि नक्सली हिंसा काबू से बाहर हो रही है, हमारी प्रांतीय सरकारों कि उदासीनता ने इस असुर को भस्मासुर बना दिया था। यद्यपि मुझे लगता है कि शायद पहली बार पीचिदंबरम के नेतृत्व में भारत सरकार और विशेष कर गृह मंत्रालय इस समस्या से लड़ने को सक्रिय हुआ है। मेरे विचार से सरकार को खुली चुनौती स्वीकार करते हुए माओवादियों पर युद्ध बोल देना चाहिए नहीं तो यह समस्या हमारे देश को आगे चल कर न जाने कितने टुकड़ों में विभाजित करवा देगी।
साथ हे दूसरी ओरे मुझे मीडिया खासकर टी वी चैनलों से भारी शिकायत है , जितना वक़्त शोइअब सान्या के विवाह की खबर पर दिया गया शायद उसका आधा वक़्त भी इस माओवादी हिंसा को नहीं दिया गया। सबसे दुखद बात तो यह है की बहुत से टी वी पत्रकार अपनी रिपोर्ट्स में अक्सर नक्सली और माओवादियों के प्रति सहानुभूति दर्शाते रहते हैं , मेरे ख़याल से यह तो गलत हो रहा है , मैं मानता हूँ की सरकारी मशीनरी और पोलिसे बहुत भ्रष्ट है और अपने कई काम भी ठीक से नहीं कर सकती हैं , परन्तु हमारे देश की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया करीब करीब बेदाग़ रही है। माओवादियों या नक्सलियों को मुख्या धारा में आकर जनता के हितों के लिए लड़ना चाहिए और भ्रष्ट नेताओं को हराना चाहिए ; जो की भ्रष्टाचार की असली जड़ हैं । परन्तु हिंसा निंदनीय है.
Saturday, February 27, 2010
होली मुबारक
सभी मित्रों और कभी कभार मेरे ब्लॉग को पढने वालों को होली की विशेष शुभकामनाएं ।
आया रंगों का है त्यौहार
अबीर और गुलाल की है बहार ,
होली मुबारक कहे मन बार-बार.
आया रंगों का है त्यौहार
अबीर और गुलाल की है बहार ,
होली मुबारक कहे मन बार-बार.
Friday, February 12, 2010
शाबाश शाहरुख़ खान शाबाश
मित्रों ,
मैं आज शाहरुख़ खान और उनके सहयोगी करन जोहर को विशेष बधाई देना चाहता हूँ क्योंकि उन्होंने एक असंवैधानिक और किसी मायने में गैर कानूनी शक्ति जो की मुंबई में शिव सेना के रूप में हमारे सामने है,उसके सामने घुटने टेकने से इनकार कर एक मिसाल पेश करी। मैं पिछले कई दिनों से यह इंतज़ार कर रहा था की कब शाहरुख़ ठाकरे परिवार से शिष्टाचार मुलाक़ात की आड़ में मिल कर क्षमा याचना करते हैं , क्योंकि मुझे लगा उनकी फिल्म माई नेम इज खान को अछि भली पब्लिसिटी मिल गयी है और एक अच्छे व्यापारी के रूप में वोह ठाकरे की धमकियों के आगे झुक जायेंगे .परन्तु उन्होंने अपना जो रुख बनाया है वोह तारीफ के काबिल है और बॉलीवुड फिल्मों की दीवानी जनता ने उनका पूरा साथ दिया।
साथ ही मैं शरद पवार से बहुत मायूस हूँ क्योंकि उन्होंने महाराष्ट्र की एक बड़ी राजनितिक ताकत और एक लोकप्रिय नेता होने के बावजूद घुटने टेक दिए। लेकिन कोई बात नहीं क्योंकि यह तो राजनीतिकों की आम बात है।
पर मुझे ख़ुशी है की चालों कहीं तो अभिनेता नेता से मजबूत साबित हुआ.
मैं आज शाहरुख़ खान और उनके सहयोगी करन जोहर को विशेष बधाई देना चाहता हूँ क्योंकि उन्होंने एक असंवैधानिक और किसी मायने में गैर कानूनी शक्ति जो की मुंबई में शिव सेना के रूप में हमारे सामने है,उसके सामने घुटने टेकने से इनकार कर एक मिसाल पेश करी। मैं पिछले कई दिनों से यह इंतज़ार कर रहा था की कब शाहरुख़ ठाकरे परिवार से शिष्टाचार मुलाक़ात की आड़ में मिल कर क्षमा याचना करते हैं , क्योंकि मुझे लगा उनकी फिल्म माई नेम इज खान को अछि भली पब्लिसिटी मिल गयी है और एक अच्छे व्यापारी के रूप में वोह ठाकरे की धमकियों के आगे झुक जायेंगे .परन्तु उन्होंने अपना जो रुख बनाया है वोह तारीफ के काबिल है और बॉलीवुड फिल्मों की दीवानी जनता ने उनका पूरा साथ दिया।
साथ ही मैं शरद पवार से बहुत मायूस हूँ क्योंकि उन्होंने महाराष्ट्र की एक बड़ी राजनितिक ताकत और एक लोकप्रिय नेता होने के बावजूद घुटने टेक दिए। लेकिन कोई बात नहीं क्योंकि यह तो राजनीतिकों की आम बात है।
पर मुझे ख़ुशी है की चालों कहीं तो अभिनेता नेता से मजबूत साबित हुआ.
Saturday, January 9, 2010
सर्दी कोहरा और हम.
मित्रों ,
पिछले दिनों से हम सभी ख़ास कर के उत्तर भारतीय लोग सर्दी की बेरहम मार से परेशान हैं। देखिये किस प्रकार कोहरे ने हमारे देश की परिवहन व्यवस्था को गड़बड़ा दिया है , शायद कोहरे में बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी ही कहीं भी पहुँचने की गारंटी हैं , क्योंकि अब कार से सफ़र तो मुश्किल है, और शायद रेल से १०-१२ घंटे की देरी से पहुँच जाएँ परन्तु हवाई जहाज उड़ान भरेगा की नहीं कह नहीं सकते। हमारे देश की सेना सियाचिन और कारगिल में दुश्मन का सामना कर सकती है, परन्तु हमारी रेल और हवाई यातायात व्यवस्था कोहरे की दया पर मोहताज़ है।
परन्तु हमारे मीडिया वालों पर तो सर्दी और कोहरा दयावान है उनको तो अपनी ख़बरों को बेचने के लिए एक नया मसाला मिल गया है। हर बार सर्दी के नए रिकॉर्ड बनते हैं जिससे की हम लोग बड़े ध्यान से देखते हैं या पढ़ते हैं । खैर कुछ भी हो मुझे तो सर्दियों का मौसम खाने और पीने के हिसाब से अति उत्तम लगता है। ढेरों गरम -गरम पकवान और सूप , चाय या काफी की चुस्कियों का क्या कहना।
तो मित्रों मज़े करिए सर्दी और कोहरे का आनंद लीजिये और विशेष रूप से अपने सर्वश्रेष्ठ ऊनी परिधानों को पहन कर के इठला के खूब घूमें और मज़ा करें.
पिछले दिनों से हम सभी ख़ास कर के उत्तर भारतीय लोग सर्दी की बेरहम मार से परेशान हैं। देखिये किस प्रकार कोहरे ने हमारे देश की परिवहन व्यवस्था को गड़बड़ा दिया है , शायद कोहरे में बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी ही कहीं भी पहुँचने की गारंटी हैं , क्योंकि अब कार से सफ़र तो मुश्किल है, और शायद रेल से १०-१२ घंटे की देरी से पहुँच जाएँ परन्तु हवाई जहाज उड़ान भरेगा की नहीं कह नहीं सकते। हमारे देश की सेना सियाचिन और कारगिल में दुश्मन का सामना कर सकती है, परन्तु हमारी रेल और हवाई यातायात व्यवस्था कोहरे की दया पर मोहताज़ है।
परन्तु हमारे मीडिया वालों पर तो सर्दी और कोहरा दयावान है उनको तो अपनी ख़बरों को बेचने के लिए एक नया मसाला मिल गया है। हर बार सर्दी के नए रिकॉर्ड बनते हैं जिससे की हम लोग बड़े ध्यान से देखते हैं या पढ़ते हैं । खैर कुछ भी हो मुझे तो सर्दियों का मौसम खाने और पीने के हिसाब से अति उत्तम लगता है। ढेरों गरम -गरम पकवान और सूप , चाय या काफी की चुस्कियों का क्या कहना।
तो मित्रों मज़े करिए सर्दी और कोहरे का आनंद लीजिये और विशेष रूप से अपने सर्वश्रेष्ठ ऊनी परिधानों को पहन कर के इठला के खूब घूमें और मज़ा करें.
Friday, December 4, 2009
हिन्दी ब्लॉग पर विज्ञापन क्यों नहीं ?
मित्रों और हिन्दी ब्लॉग्गिंग की दुनिया के साथियों ,
क्या यह एक प्रकार का भाषाई भेदभाव नहीं है कि गूगल जो कि ब्लॉगर.कॉम की मातृ संस्था है , वोह मेरे जैसे ब्लॉग पर सिर्फ़ इसीलिए विज्ञापन नहीं देती क्योंकि हम हिन्दी भाषा में ब्लॉग लिख रहे हैं। मित्रों मेरी पूरी शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम से हुई और अंग्रेज़ी पर मेरा अच्छाकमांड है परन्तु ब्लॉग की शुरुआत करते समय मैंने सोचा की जब मेरे मन में खयालात और मेरे मन के विचारों को उदगम मेरे मष्तिष्क में हिन्दी में होता है तो क्यों न मैं हिन्दी में ही लिखूं। वैसे तो मैं अपने आप को कोई बहुत प्रतिभाशाली ब्लॉगर नहीं मानता परन्तु गूगल द्वारा मेरे ब्लॉग पर सिर्फ़ इसीलिए विज्ञापन देना मना कर दिया गया क्योंकि मेरी भाषा हिन्दी है मेरी थोड़ी सी प्रतिभा और लेखी और मेरी मात्रभाषा का असम्मान है। यदि किसी अन्य कारण से वोह मना करते जैसे की मेरे ब्लॉग की पाठक संख्या कम है इत्यादि तो मैं समझ सकता परन्तु सिर्फ़ इसलिए की हमारा ब्लॉग हिन्दी में है यह बहाना तो हम हिंदीभाषियों की शान के ख़िलाफ़ है। मैं बड़ी उत्सुकता से आप सभी की प्रतिक्रया का इंतज़ार करूंगा.
क्या यह एक प्रकार का भाषाई भेदभाव नहीं है कि गूगल जो कि ब्लॉगर.कॉम की मातृ संस्था है , वोह मेरे जैसे ब्लॉग पर सिर्फ़ इसीलिए विज्ञापन नहीं देती क्योंकि हम हिन्दी भाषा में ब्लॉग लिख रहे हैं। मित्रों मेरी पूरी शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम से हुई और अंग्रेज़ी पर मेरा अच्छाकमांड है परन्तु ब्लॉग की शुरुआत करते समय मैंने सोचा की जब मेरे मन में खयालात और मेरे मन के विचारों को उदगम मेरे मष्तिष्क में हिन्दी में होता है तो क्यों न मैं हिन्दी में ही लिखूं। वैसे तो मैं अपने आप को कोई बहुत प्रतिभाशाली ब्लॉगर नहीं मानता परन्तु गूगल द्वारा मेरे ब्लॉग पर सिर्फ़ इसीलिए विज्ञापन देना मना कर दिया गया क्योंकि मेरी भाषा हिन्दी है मेरी थोड़ी सी प्रतिभा और लेखी और मेरी मात्रभाषा का असम्मान है। यदि किसी अन्य कारण से वोह मना करते जैसे की मेरे ब्लॉग की पाठक संख्या कम है इत्यादि तो मैं समझ सकता परन्तु सिर्फ़ इसलिए की हमारा ब्लॉग हिन्दी में है यह बहाना तो हम हिंदीभाषियों की शान के ख़िलाफ़ है। मैं बड़ी उत्सुकता से आप सभी की प्रतिक्रया का इंतज़ार करूंगा.
Tuesday, December 1, 2009
चलो सड़क जम करते हैं .
मित्रों
हम सभी लोग जो अपने अपने प्रान्तों के क्षेत्रीय अखबार पढ़ते हैं , प्रतिदिन की ख़बरों में अपने -अपने क्षेत्र में लगने वाले रोड जामकी ख़बरको प्रमुखता से पाते हैं। अब तो कुछ भी हो जाए रोड जाम करने का उपाय भी बढ़िया है। कोई दुर्घटना हो जाए तो जाम आवश्यक है परन्तु साथ ही में बिजली या पानी न आने पर , किसी लड़के द्वारा किसी लड़की को भगाए जाने पर, किसी भी सरकारी फैसले का विरोध करने के लिए, स्कूल या कॉलेज में किसी भी समस्या के होने पर, किसी भी प्रतिष्ठान में वेतन बढ़ाने के लिए , और कल के समाचार पत्र के अनुसार भैंस के ,talaab में डूब के मर जाने पर , hospital में ilaaz के दौरान मर जाने पर , gaaon में baarish या toofan या सूखे से फसल ख़राब हो जाने पर , किसी neta की giraftaari या usaki मृत्यु हो जाने पर ,ityaadi ,ityaadi ityaadi । चलिए अब apani बातचीत को alpviraam detaa हूँ पुनः एक बार फिर आपके सामने अन्य विषय ज़रूर प्रस्तुत करूंगा.
हम सभी लोग जो अपने अपने प्रान्तों के क्षेत्रीय अखबार पढ़ते हैं , प्रतिदिन की ख़बरों में अपने -अपने क्षेत्र में लगने वाले रोड जामकी ख़बरको प्रमुखता से पाते हैं। अब तो कुछ भी हो जाए रोड जाम करने का उपाय भी बढ़िया है। कोई दुर्घटना हो जाए तो जाम आवश्यक है परन्तु साथ ही में बिजली या पानी न आने पर , किसी लड़के द्वारा किसी लड़की को भगाए जाने पर, किसी भी सरकारी फैसले का विरोध करने के लिए, स्कूल या कॉलेज में किसी भी समस्या के होने पर, किसी भी प्रतिष्ठान में वेतन बढ़ाने के लिए , और कल के समाचार पत्र के अनुसार भैंस के ,talaab में डूब के मर जाने पर , hospital में ilaaz के दौरान मर जाने पर , gaaon में baarish या toofan या सूखे से फसल ख़राब हो जाने पर , किसी neta की giraftaari या usaki मृत्यु हो जाने पर ,ityaadi ,ityaadi ityaadi । चलिए अब apani बातचीत को alpviraam detaa हूँ पुनः एक बार फिर आपके सामने अन्य विषय ज़रूर प्रस्तुत करूंगा.
Sunday, November 15, 2009
ब्लॉग लिखने के मायने
मित्रों ब्लॉग्गिंग की दुनिया अब एक नया मुकाम हासिल कर रही है और निरंतर बढ़ रही है। मुझे ब्लॉग्गिंग का इतिहास तो पता नहीं लेकिन यह तो पता है की यह एक शिक्षित व्यक्ति की भावनाओं को व्यक्त करने का सबसे अछा माध्यम है.
Thursday, October 15, 2009
Monday, September 28, 2009
नक्सलवाद और माओवाद
मेरे अनुसार प्रत्येक भारतीय को नकसली हिंसा की निंदा और भर्त्सना करनी चाहिए। यह हमारे देश के लिए आतंकवाद से भी बड़ा ख़तरा है.
Thursday, September 10, 2009
इशरत जहाँ का फर्जी एनकाउंटर और हमारा मीडिया.
मित्रों,
पिछले दो दिनों हमारे सामने आने वाली टी वी और अखबारों की ख़बरों में गुजरात के अहमदाबाद में २००४ में हुए एक एनकाउंटर को फर्जी साबित करने वाली सूचनाएँ मिली ।
अगर हम गौर से याद करें तो जिन लोगों के जेहन में २००४ जून की टी वी या अखबार की खबरें होंगी उन्हें तो यह याद होगा की उस समय यही मीडिया तस्वीर के उस पहलु को दिखा रहा था जिसको वोह आज झूठा और ग़लत बता रहा है। उस समय उनके हिसाब से यह लश्कर के आतंकवादियों के सफाए के बारे में एक कदम था और गुजरात सरकार और उनकी पुलिस का यह एक बहादुरी भरा कदम था।
परन्तु आज एक मजिस्ट्रेट की एक रिपोर्ट जिसके कुछ निहित स्वार्थ हो सकते हैं बहार आने के बाद हमारा मीडिया उस समय के तत्कालीन पोलिसव्वालों को एक जल्लाद और कातिल के रूप में पेश कर रहा है।
यहाँ मैं कुछ कहना चाहता हूँ की क्या पुलिसवालों की गलती इशरत और उसके आतंकी साथियों को निर्दोष बना देती है? क्या इस लड़की और उसके साथियों का कार्य राष्ट्रविरोधी नहीं थे ? हमारा मीडिया आज उस लड़की और उसके मित्र को एक शहीद का दर्जा डे रहा है। मैं मानता हूँ की पुलिस के आला अधिकारियों का इन दोषियों को सज़ा देने का तरीका ग़लत था परन्तु उनकी गलती इन लोगों संदेह के दायरे से बहार नहीं करता। यद्यपि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुछ पत्रकारों ने जावेद के संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त पाया। और यह भी पता चला है की इशरत उस युवक के साथ एक निरंतर साथी और पार्टनर की तरह विभिन्न शहरों की यात्राएं करती थी। क्यों नहीं इशरत जहाँ का परिवार यह बताता की ऐसा क्या कारन और कार्य था जहाँ एक रुदिवादी मुस्लिम परिवार की लड़की अपने परिवार को बत्ताए बिना इधर उधर जाती थी। दूसरी ओर यहाँ हमें अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए यह भी सोचना चाहिए की क्या कारण थे की बाकी के दो युवकों की लाश लेने भी कोई नहीं आया? हो सकता है की पुलिस ने अपनी कहानी में उनके मन गड़ंत नाम रख दिए हों परन्तु उन दोनों के बारे में कोई भली बात भी सामने नहीं आई।
इसलिए मेरा इस मुल्क के जिम्मेदार मीडिया से अनुरोध है की कृपया करके आतंकियों और संदिग्ध चरित्र के लोगों को शहीद न बनाएं और पुलिस के ग़लत तरीकों को ज़रूर सामने ला कर एक जिम्मेदार नागरिक का फ़र्ज़ अदा करें.
पिछले दो दिनों हमारे सामने आने वाली टी वी और अखबारों की ख़बरों में गुजरात के अहमदाबाद में २००४ में हुए एक एनकाउंटर को फर्जी साबित करने वाली सूचनाएँ मिली ।
अगर हम गौर से याद करें तो जिन लोगों के जेहन में २००४ जून की टी वी या अखबार की खबरें होंगी उन्हें तो यह याद होगा की उस समय यही मीडिया तस्वीर के उस पहलु को दिखा रहा था जिसको वोह आज झूठा और ग़लत बता रहा है। उस समय उनके हिसाब से यह लश्कर के आतंकवादियों के सफाए के बारे में एक कदम था और गुजरात सरकार और उनकी पुलिस का यह एक बहादुरी भरा कदम था।
परन्तु आज एक मजिस्ट्रेट की एक रिपोर्ट जिसके कुछ निहित स्वार्थ हो सकते हैं बहार आने के बाद हमारा मीडिया उस समय के तत्कालीन पोलिसव्वालों को एक जल्लाद और कातिल के रूप में पेश कर रहा है।
यहाँ मैं कुछ कहना चाहता हूँ की क्या पुलिसवालों की गलती इशरत और उसके आतंकी साथियों को निर्दोष बना देती है? क्या इस लड़की और उसके साथियों का कार्य राष्ट्रविरोधी नहीं थे ? हमारा मीडिया आज उस लड़की और उसके मित्र को एक शहीद का दर्जा डे रहा है। मैं मानता हूँ की पुलिस के आला अधिकारियों का इन दोषियों को सज़ा देने का तरीका ग़लत था परन्तु उनकी गलती इन लोगों संदेह के दायरे से बहार नहीं करता। यद्यपि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुछ पत्रकारों ने जावेद के संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त पाया। और यह भी पता चला है की इशरत उस युवक के साथ एक निरंतर साथी और पार्टनर की तरह विभिन्न शहरों की यात्राएं करती थी। क्यों नहीं इशरत जहाँ का परिवार यह बताता की ऐसा क्या कारन और कार्य था जहाँ एक रुदिवादी मुस्लिम परिवार की लड़की अपने परिवार को बत्ताए बिना इधर उधर जाती थी। दूसरी ओर यहाँ हमें अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए यह भी सोचना चाहिए की क्या कारण थे की बाकी के दो युवकों की लाश लेने भी कोई नहीं आया? हो सकता है की पुलिस ने अपनी कहानी में उनके मन गड़ंत नाम रख दिए हों परन्तु उन दोनों के बारे में कोई भली बात भी सामने नहीं आई।
इसलिए मेरा इस मुल्क के जिम्मेदार मीडिया से अनुरोध है की कृपया करके आतंकियों और संदिग्ध चरित्र के लोगों को शहीद न बनाएं और पुलिस के ग़लत तरीकों को ज़रूर सामने ला कर एक जिम्मेदार नागरिक का फ़र्ज़ अदा करें.
Wednesday, August 12, 2009
स्वाइन फ्लू का डर और हम तथा हमारी सरकार और मीडिया
मित्रों,
इन दिनों सभी भारतवासी अपने अन्दर इस नए रोग के हमले को लेकर चिंता पाले हुए हैं । मुझे लगता है की इस परेशानी का मुकाबला करने से ज्यादा हमारा सरकारी तंत्र रोज़ आम जनता को भ्रमित कर रहा है। मुझे लगता है हमारे मुल्क का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो इस समस्या में छिपी व्यापारिक संभावनाओं को तलाश रहा है। उनके लिए तो सनसनीखेज बातों को कह कर और भ्रम फैला कर अपनी टी आर पी बढ़ाना ही इसका इलाज़ है। दोस्तों घबराने और भ्रम फैलाने से या फिर सरकार को कोसने से कुछ नहीं होगा। जिन सरकारी स्वस्थ केन्द्रों पर साधारण इलाज़ की सुविधाएं भी नहीं हैं वहाँ यह सब कैसे होगा?
इन दिनों सभी भारतवासी अपने अन्दर इस नए रोग के हमले को लेकर चिंता पाले हुए हैं । मुझे लगता है की इस परेशानी का मुकाबला करने से ज्यादा हमारा सरकारी तंत्र रोज़ आम जनता को भ्रमित कर रहा है। मुझे लगता है हमारे मुल्क का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो इस समस्या में छिपी व्यापारिक संभावनाओं को तलाश रहा है। उनके लिए तो सनसनीखेज बातों को कह कर और भ्रम फैला कर अपनी टी आर पी बढ़ाना ही इसका इलाज़ है। दोस्तों घबराने और भ्रम फैलाने से या फिर सरकार को कोसने से कुछ नहीं होगा। जिन सरकारी स्वस्थ केन्द्रों पर साधारण इलाज़ की सुविधाएं भी नहीं हैं वहाँ यह सब कैसे होगा?
Monday, August 3, 2009
मुझे गुस्सा क्यों आता है? मैं इसे कैसे काबू करुँ ?
मित्रों,
पिछले दिनों से मैं अपने क्रोध को काबू करने की कोशिश करता हूँ ,परन्तु बहुत छोटी -छोटी बातों पर मैं अपने पर काबू नहीं रख पाता जबकि मैं ऐसे बहुत से मसलों पर जो कि महत्वपूर्ण होते हैं या ज्यादा बड़े हैं उन पर मैं अपने आप पर काबू कर के अक्सर शांत दिमाग से काम कर लेता हूँ तो फिर छोटे मोटे मसलों पर मैं क्यों नहीं संयमित नहीं रह सकता हूँ ?
मित्रों सलाह दीजिये कि क्या करा जाए ।
पिछले दिनों से मैं अपने क्रोध को काबू करने की कोशिश करता हूँ ,परन्तु बहुत छोटी -छोटी बातों पर मैं अपने पर काबू नहीं रख पाता जबकि मैं ऐसे बहुत से मसलों पर जो कि महत्वपूर्ण होते हैं या ज्यादा बड़े हैं उन पर मैं अपने आप पर काबू कर के अक्सर शांत दिमाग से काम कर लेता हूँ तो फिर छोटे मोटे मसलों पर मैं क्यों नहीं संयमित नहीं रह सकता हूँ ?
मित्रों सलाह दीजिये कि क्या करा जाए ।
Thursday, July 16, 2009
नक्सलवाद का नासूर
मित्रों,
पिछले दिनों मीडिया के सभी प्रतिरूपों में कई सारी नक्सलवादी घटनाओं के बारे में सभी ने पढा होगा । मुझे तो यह सब पढ़ कर हमारे देश के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती मालूम पड़ती है। मित्रों हमारे देश में अब तक जो भी आतंकवादी या उग्रवादी आन्दोलन हुए वोह मुख्यतः कुछ क्षेत्रों में हे सीमित रहा और इन हिंसक आन्दोलनों के पीछे विदेशी मदद का भी बहुत योगदान था। हमारी सरकार भी काफ़ी हद तक इन हिंसक आन्दोलनों को काबू कर पायी है । परन्तु अब नक्सलवाद का ज़हर धीमे धीमे पूरे मुल्क में फ़ैल रहा है , यह बहुत गंभीर समस्या है। एक ओरे यदि इसे पूरी ताक़त से कुचलने की आव्यश्यक्ता है , तो दूसरी ओर इसकी जड़ में भी पहुँचने की आव्यश्यक्ता है। मेरी समझ में इन आन्दोलनों को जन समर्थन का कारण आम जनता के हमारी शाशन व्यवस्था में ख़तम हो रहे विश्वास में है। दिन प्रतिदिन आम आदमी का क़ानून से भरोसा उठ रहा है, क्योंकि राजनेताओं और नौकरशाहों ने हमारे देश के सम्विधान और क़ानून को अपनी सुविधा से तोड़ना और मरोड़ना शुरू कर दिया है। मैं समझता हूँ शाशन और सत्ता के शीर्ष पद पर बैठे लोगों को जाग जाना चाहिए क्योंकि यदि इस प्रकार के हिंसक नक्सलवादी आन्दोलनों का जन समर्थन बढ़ गया तो उन्हें और उनके परिवारों को सबसे ज्यादा कष्ट उठाना पड़ेगा , क्योंकि आम जनता तो सारे कष्ट किसी न किसी तरह से बर्दाश्त कर लेगी पर इस कुलीन वर्ग का काया होगा?
अभी भी वक़्त है राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए जनता के लिए , जनता के द्वारा और जनता का राज कायम करें और भारत को आगे ले जाएँ.
पिछले दिनों मीडिया के सभी प्रतिरूपों में कई सारी नक्सलवादी घटनाओं के बारे में सभी ने पढा होगा । मुझे तो यह सब पढ़ कर हमारे देश के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती मालूम पड़ती है। मित्रों हमारे देश में अब तक जो भी आतंकवादी या उग्रवादी आन्दोलन हुए वोह मुख्यतः कुछ क्षेत्रों में हे सीमित रहा और इन हिंसक आन्दोलनों के पीछे विदेशी मदद का भी बहुत योगदान था। हमारी सरकार भी काफ़ी हद तक इन हिंसक आन्दोलनों को काबू कर पायी है । परन्तु अब नक्सलवाद का ज़हर धीमे धीमे पूरे मुल्क में फ़ैल रहा है , यह बहुत गंभीर समस्या है। एक ओरे यदि इसे पूरी ताक़त से कुचलने की आव्यश्यक्ता है , तो दूसरी ओर इसकी जड़ में भी पहुँचने की आव्यश्यक्ता है। मेरी समझ में इन आन्दोलनों को जन समर्थन का कारण आम जनता के हमारी शाशन व्यवस्था में ख़तम हो रहे विश्वास में है। दिन प्रतिदिन आम आदमी का क़ानून से भरोसा उठ रहा है, क्योंकि राजनेताओं और नौकरशाहों ने हमारे देश के सम्विधान और क़ानून को अपनी सुविधा से तोड़ना और मरोड़ना शुरू कर दिया है। मैं समझता हूँ शाशन और सत्ता के शीर्ष पद पर बैठे लोगों को जाग जाना चाहिए क्योंकि यदि इस प्रकार के हिंसक नक्सलवादी आन्दोलनों का जन समर्थन बढ़ गया तो उन्हें और उनके परिवारों को सबसे ज्यादा कष्ट उठाना पड़ेगा , क्योंकि आम जनता तो सारे कष्ट किसी न किसी तरह से बर्दाश्त कर लेगी पर इस कुलीन वर्ग का काया होगा?
अभी भी वक़्त है राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए जनता के लिए , जनता के द्वारा और जनता का राज कायम करें और भारत को आगे ले जाएँ.
Sunday, June 28, 2009
माइकल जैक्सन निः संकोच सबसे बड़ा पॉप सितारा
मित्रों,
माइकल जैक्सन से मेरा पहला परिचय १४ वर्ष की उम्र में अपने कॉलेज जाते रिश्तेदार के कमरे में लगे उनके आदमकद पोस्टर से हुआ। तब तक मेरी इंग्लिश गानों की जानकारी मेरे स्कूल की कुछ सुबह की प्रार्थनाओं तक ही सिमित थी। अपने उन भ्राताश्री से ही मैंने पहली बार उस महान कलाकार के बारे में जाना और उनके इम्पोर्टेड टू-इन-वन पर उनका गाना बीट इट सुना जिसकी ध्वनि आज भी मेरे दिमाग में है। मैं न तो कोई विशेष संगीत प्रेमी हूँ और न ही मेरी रूचि इंग्लिश पॉप गानों में ज्यादा रही परन्तु मैं हमेशा अपने कॉलेज के दिनों में माइकल जैक्सन के एल्बम के कैसेट जरूर खरीदता, और जैसे ही मुझे कॉलेज के दौरान स्वतंत्र रूप से कमरा ले कर रहने का अवसर मिला तो मैंने उस कमरे की बालकनी के दरवाजे पर अपने अग्रज जैसा ही माइकल का आदमकद पोस्टर लगाया , जिसके कारण मेरी मित्र मंडली में मेरे घर की एक अलग चर्चा कई दिनों तक हुई।
कॉलेज के दौरान ही हमारे शहर में केबल टी.वि के माध्यम से ऍम टी.वि का आगाज़ हुआ और मुझे उनके विडियो देखने का सौभाग्य हुआ। परन्तु न जाने कब जीवन की भाग दौड़ में माइकल का संगीत पीछे छूट गया और केबल पर आने वाले म्यूजिक चैनल्स का देशीकरण होने से इंग्लिश पॉप संगीत का आकर्षण भी छूट गया। परन्तु इस महान मनोरंजन करता की मृत्यु ने मेरे मन में पुनः उनकी याद ताज़ा कर दी और मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ की उनकी आत्मा को शान्ति मिले।
माइकल जैक्सन से मेरा पहला परिचय १४ वर्ष की उम्र में अपने कॉलेज जाते रिश्तेदार के कमरे में लगे उनके आदमकद पोस्टर से हुआ। तब तक मेरी इंग्लिश गानों की जानकारी मेरे स्कूल की कुछ सुबह की प्रार्थनाओं तक ही सिमित थी। अपने उन भ्राताश्री से ही मैंने पहली बार उस महान कलाकार के बारे में जाना और उनके इम्पोर्टेड टू-इन-वन पर उनका गाना बीट इट सुना जिसकी ध्वनि आज भी मेरे दिमाग में है। मैं न तो कोई विशेष संगीत प्रेमी हूँ और न ही मेरी रूचि इंग्लिश पॉप गानों में ज्यादा रही परन्तु मैं हमेशा अपने कॉलेज के दिनों में माइकल जैक्सन के एल्बम के कैसेट जरूर खरीदता, और जैसे ही मुझे कॉलेज के दौरान स्वतंत्र रूप से कमरा ले कर रहने का अवसर मिला तो मैंने उस कमरे की बालकनी के दरवाजे पर अपने अग्रज जैसा ही माइकल का आदमकद पोस्टर लगाया , जिसके कारण मेरी मित्र मंडली में मेरे घर की एक अलग चर्चा कई दिनों तक हुई।
कॉलेज के दौरान ही हमारे शहर में केबल टी.वि के माध्यम से ऍम टी.वि का आगाज़ हुआ और मुझे उनके विडियो देखने का सौभाग्य हुआ। परन्तु न जाने कब जीवन की भाग दौड़ में माइकल का संगीत पीछे छूट गया और केबल पर आने वाले म्यूजिक चैनल्स का देशीकरण होने से इंग्लिश पॉप संगीत का आकर्षण भी छूट गया। परन्तु इस महान मनोरंजन करता की मृत्यु ने मेरे मन में पुनः उनकी याद ताज़ा कर दी और मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ की उनकी आत्मा को शान्ति मिले।
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